मंगलवार, 10 मई 2016

महान क्रांति का शंखनाद

सत साहेब ,,,, ये उत्पात नहीं महानक्रान्ति का शंखनाद हैं जिसमे एक सच्चे संत और उनके अनुयायियों ने ठान लिया है कि चाहे जो भी हो वो इन भ्रष्ट नेताओं , मीडिया और सरकार और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे ,,,,वेशक कुछ छोटी सोच रखने वाले , अपने आप तक मतलब रखने वाले और मुर्ख किस्म के पढ़े लिखे लोग जो अपने विवेक खो चुके हैं इसे उत्पात , दंगा या मारपीट का नाम दें पर कोई भी घटना क्यूँ होती है कैसी होती है उसका परिणाम भविष्य में तय होता है ना कि लोगों की अटकलों से ,,,, वैसे भी समाज के लोगों को एक बात सोचनी चाहिए कि आखिर क्यूँ एक संत और उसके शिष्य बार बार एक ही मांग कर रहे हैं कि हमारे केस की सीबीआई से जांच हो और हमें न्याय मिलें , पर जहां एक तरफ राक्षस किस्म के लोग हैं वोही पर भगत भी हैं और विवेक शील जनता को यह देखना चाहिए कि जहां आजकल के संत राजनीति को अपना मोहरा बनाकर चलते हैं और कहीं न कहीं राजनेताओं से अपना तालुक रखते हैं क्या वो एक संत विचार धरा के हैं , जब उनसे पूछा जाता हैं कि संतो का राजनीति से क्या तालुक तो कहते हैं कि संतो के दरवाजे सबके लिए खुले होते हैं , संतो के दरवाजे सिर्फ भगत समाज के लिए खुलते हैं ना कि चोर लुटेरो के लिए और एक संत रामपाल जी महाराज के अनुयायी और खुद संत रामपाल जी महाराज ही हैं जिन्होंने पाखंड और बढ़ते अत्याचार के खिलाफ आवाज उठायी हैं और ये आवाज कहां तक बुलंद होगी आने वाले समय में पता चल जाएगा और समाज एक दिन उनका लोहा मानेगा ..... आजकल कोई अपने रोजगार के लिए लड़ रहा हैं , कोई जमीन के लिए और संत रामपाल जी महाराज और उनके चेले ही हैं जो धर्म कि स्थापना और सत मार्ग के लिए संघर्ष शील हैं और अपने आखिरी दम तक रहेगा वैसे भी परमात्मा कबीर कि वाणी हैं : धर्म तो धसके नहीं धसके तीनो लोक सत साहेब अवश्य देखे साधना चैनल रात 7.45 से 8.45 तक और हरियाणा न्यूज़ सुबह 6 बजे से 7 बजे तक

शुक्रवार, 6 मई 2016

आरोपी कभी सीबीआई जांच कराने की मांग नहीं करता


हिम्मत है तो मेरे गुरु पर लगे आरोप सिद्ध करके दिखाओ हिम्मत है तो मेरे परमेश्वर द्वारा दिए ज्ञान को गलत साबित करके दिखाओ अरे मूर्खों :- समझो दिमाग का प्रयोग करो पूरे ब्रह्माण्ड के धर्म गुरुओं को ललकारने वाला सभी धर्मों के गर्न्थो को खोलकर संगत को शिक्षित करने वाला प्रमाण सहित धर्मगुरुओं को गलत साबित करने वाला छाती ठोक कर अपने आप को परमेश्वर का दूत्त कहने वाले को कोई जेल में कैसे बन्द कर सकता है ? या तो कोई कारण है जिसे ना तुम समझ पाये और ना ज्योति निरंजन जब जगत गुरु जेल से बाहर आएंगे तुम भी पछताओगे और तुम्हारा आका भी रोहतक वाली जिस जेल में सन्त रहा वहां से जेल को ही ट्रांसफर करना पड़ा आज वहां पार्क है । फिर हिसार वाली जेल भी कहाँ रह पावेगी ? खट्टर फटर की तो विसात ही क्या ? हमारी लड़ाई ज्योति निरंजन भगवान से हैं मेरी लड़ाई अज्ञान से है और आखिर जीत मेरी है

गुरुवार, 5 मई 2016

इच्छा दासी काल की


🙏🏻🙏🏻कबीर बाणी🙏🏻🙏🏻 इच्छा दासी यम की खडी रहे दरबार.. पाप पूण्य दो बीर , ये खसमी नार... अर्थ- ये इच्छा काल की दासी हैा. इच्छा आत्मा को काल के दरबार मे खडा कर देती हैा पाप और पूण्य ये दो भाई है.. इच्छा इन दोनो की पत्नी है.. इच्छा ही पाप और पूण्य करवाती हैा... पाप - को कबीर परमात्मा का सतनाम मंत्र समाप्त करेगा.. इच्छा- को आप समाप्त करो मालिक के तत्वज्ञान रूपी शास्त्र से ... सतगुरू मिले तो इच्छा मिटे, पद मिले पद समाना.. चल हंसा उस लोक पठाऊ , जहा आदि अमर अस्थाना.. पूण्य- को काल के कर्ज के रूप मे दे देगे... तब सतलोक जा सकते हैा... कबीर - जिवित मुक्ता सो कहो आशा तृष्णा खंड.. मन के जीते जीत है क्यो भरमे ब्रह्मांड... अर्थ- जिसकी आशा तृष्णा समाप्त हो गई है मतलब इच्छा समाप्त हो गई है उसको जिवित मरना कहते है वह जिवित संसार मे रहकर भी संसार से मुक्त हो जाता हैा. उसको ही मन जीतना कहते हैा मन को जीतने के बाद ही आप सतलोक जा सकते हैा.. जो योगी तप करते दिखाई देते है लेकिन इनका मन ब्रहाांड मे घूम रहा होता हैा तप से राज मिलता है मुक्ती नही.. भवार्थ- जिन लोगो की इच्छा सतलोक मे जाने की हो गई है उसकी इस संसार से आशा तृष्णा समाप्त हो गई हैा वह लोग इस संसार को जरूरत के हिसाब से जी रहे हैा लेकिन जो लोगो संसार को ख्वाईस के हिसाब से जी रहे हैा वह भगत नही हैा जैसे एक बीवी अापकी जरूरत हैा अपनी बीवी को छोडकर गैर स्त्री पर बुरी नजर डालना वो आपकी ख्वाईस कहलाती हैा.. एक इंसान के रहने के लिए एक कमरा जरूरत हैा कोठी बंगले आपकी खवाईस हैा.. जिनको मालिक ने कोटि बंगले दिये है अच्छी बात है लेकिन जिनके पास नही है वह भक्ति करे रीस ना ना करे.. दो वक्त की रोटी जरूरत हैा 36 तरह के पकवान की इच्छा आपकी ख्वाईस हैा.... भगत दास हो तो जरूरत के हिसाब से जीना सीख लो.. ख्वाईस के हिसाब से जो जीता है वह भगत नही हैा.. गुरू जी कहते है मालिक ने जिसको जितना दिया हैा उस मे खुश रहो.. दूसरो की रीस मत करो.. गुरू जी जरूरत के लिए मना नही करते बल्कि ख्वाईसो के लिए मना करते हैैा.. जैसे टी वी पर सतसंग देखना आपकी जरूरत हैा टी वी पर फिल्मे नाटक गेम खेलना जरूरत नही है जो लोग फिल्मे नाटक देखते है वह भगत नही हैा

समाज का एक कड़वा सच

एक दिन पंडित को प्यास लगी, संयोगवश घर में पानी नहीं था। इसलिए उसकी पत्नी पड़ोस से पानी ले आई। पानी पीकर पंडित ने पूछा.... पंडित - कहाँ से लायी हो? बहुत ठंडा पानी है। पत्नी - पड़ोस के कुम्हार के घर से। (पंडित ने यह सुनकर लोटा फेंक दिया और उसके तेवर चढ़ गए। वह जोर-जोर से चीखने लगा ) पंडित - अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया। कुम्हार ( शूद्र ) के घर का पानी पिला दिया। (पत्नी भय से थर-थर कांपने लगी) उसने पण्डित से माफ़ी मांग ली। पत्नी - अब ऐसी भूल नहीं होगी। शाम को पण्डित जब खाना खाने बैठा तो घर में खाने के लिए कुछ नहीं था। पंडित - रोटी नहीं बनाई। भाजी नहीं बनाई। क्यों???? पत्नी - बनायी  तो थी। लेकिन अनाज पैदा करने वाला कुणबी(शूद्र) था और जिस कड़ाई में बनाया था, वो कड़ाई लोहार (शूद्र) के घर से आई थी। सब फेंक दिया। पण्डित - तू पगली है क्या?? कहीं अनाज और कढ़ाई में भी छूत होती है? यह कह कर पण्डित बोला- कि पानी तो ले आओ। पत्नी - पानी तो नहीं है जी। पण्डित - घड़े कहाँ गए??? पत्नी - वो तो मैंने फेंक दिए। क्योंकि कुम्हार के हाथ से बने थे। पंडित बोला- दूध ही ले आओ। वही पीलूँगा। पत्नी - दूध भी फेंक दिया जी। क्योंकि गाय को जिस नौकर ने दुहा था, वो तो नीची (शूद्र) जाति से था। पंडित- हद कर दी तूने तो यह भी नहीं जानती की दूध में छूत नहीं लगती है। पत्नी-यह कैसी छूत है जी, जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध में नहीं लगती। (पंडित के मन में आया कि दीवार से सर फोड़ लूं) वह गुर्रा कर बोला - तूने मुझे चौपट कर दिया है जा अब आंगन में खाट डाल दे मुझे अब नींद आ रही है। पत्नी- खाट!!!! उसे तो मैनें तोड़ कर फेंक दिया है जी। क्योंकि उसे शूद्र (सुथार ) जात वाले ने बनाया था। पंडित चीखा - वो फ़ूलों का हार तो लाओ। भगवान को चढ़ाऊंगा, ताकि तेरी अक्ल ठिकाने आये। पत्नी - हार तो मैंने फेंक दिया। उसे माली (शूद्र) जाति के आदमी ने बनाया था। पंडित चीखा- सब में आग लगा दो, घर में कुछ बचा भी हैं या नहीं। पत्नी - हाँ यह घर बचा है, इसे अभी तोड़ना बाकी है। क्योंकि इसे भी तो पिछड़ी जाति के मजदूरों ने बनाया है। पंडित के पास कोई जबाब नहीं था। उसकी अक्ल तो ठिकाने आयी। बाकी लोगों कि भी आ जायेगी। सिर्फ इस कहानी को आगे फॉरवर्ड करो। हो सकता है देश से जातिय भेदभाव खत्म हो जाये। एक कदम बढ़ाकर तो देखो...!!

ओम तत् सत् का वर्णन


आदरणीय भगत आत्माओं मैं आपजी के समक्ष अपने सदगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी की असीम प्रेरणा से प्राप्त ॐ तत सत मन्त्र का विस्तृत अर्थ नामक इस लेख को पोस्ट कर रहा हूँ ... आपजी इसको पढ़े तथा वास्तविक आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे || विशेष:- गीता अध्याय 4 श्लोक 34 में वर्णित तत्वदर्शी संत ही पूर्ण परमात्मा के तत्वज्ञान को सही बताता है, उन्हीं से पूछो, मैं (गीता बोलने वाला प्रभु) नहीं जानता। इसी का प्रमाण गीता अध्याय 15 श्लोक 1 से 4 तक भी है। इसीलिए यहाँ गीता अध्याय 17 श्लोक 23 से 28 तक का भाव समझें। अध्याय 17 के श्लोक 23 से 28 तक में कहा है कि पूर्ण परमात्मा के पाने के ऊँ, तत्, सत् यह तीन नाम हैं। इस तीन नाम के जाप का प्रारम्भ स्वांस द्वारा ओं (ॐ) नाम से किया जाता है। तत्वज्ञान के अभाव से स्वयं निष्कर्ष निकाल कर शास्त्रविधि सहित साधना करने वाले ब्रह्म तक की साधना में प्रयोग मन्त्रों के साथ ‘ऊँ‘ मन्त्र लगाते हैं। जैसे ‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः‘, ‘ऊँ नम: शिवायः‘ आदि-आदि। यह जाप (काल-ब्रह्म तक व उनके आश्रित तीनों ब्रह्मा जी, विष्णु जी, शंकर जी से लाभ लेने के लिए) स्वर्ग प्राप्ति तक का है। फिर भी शास्त्र विधि रहित होने से उपरोक्त मंत्र व्यर्थ हैं बेसक इन मंत्रों से कुछ लाभ भी प्राप्त हो। तत् नाम का तात्पर्य है कि (अक्षर ब्रह्म) परब्रह्म की साधना का सांकेतिक मन्त्र। यह तत् मन्त्र है। वह पूर्ण गुरु से लेकर जपा जाता है। स्वयं या अनाधिकारी से प्राप्त करके जाप करना भी व्यर्थ है। यह तत (सतनाम ) मन्त्र इष्ट की प्राप्ति के लिए विशेष मन्त्र है तथा सत् जाप मन्त्र पूर्ण परमात्मा का है जो सारनाम के साथ जोड़ा जाता है। उससे पूर्ण मुक्ति होती है। सतशब्द अविनाशी का प्रतीक है। प्रत्येक इष्ट की प्राप्ति के लिए भी "तत" शब्द है तथा सतशब्द अविनाशी का प्रतीक है। वह सारनाम है। पुण्य आत्माओं ओम् तत् सत् का विस्तृत वर्णन केवल पूर्ण सद्गुरु ही कर सकता है और🎤 पूरे विश्व में वह सतगुरु केवल संत रामपाल जी महाराज हैं जिनके पास पूर्ण मोक्ष का ज्ञान है। देखिए साधना चैनल शाम 7:30pm to 8:30 pm सत साहेब।

बड़े आश्चर्य की बात सच है इसलिए कड़वा है


क्या रामचंद्र रघुकुल वाले रामचंद्र भगवान थे/ हैं ? सच है इसलिए कडवा है.... शुद्रो से नफ़रत करने वाले , अकारण उनका वध करने वाले, नरसन्हारी, कान के कच्चे , स्वार्थी, मतलब एवं राज के लिये अपने बीवी बच्चों का त्याग करने वाले , राजा श्री रामचन्द्र जी ने अपनी पत्नी को रावण की कैद से छुडाने के लिए करोडो लोगो की आहूति दे दी। करोडो बहने विधवा करदी। करोडो बच्चे अनाथ कर दिये। 14 साल बाद जब सीता सहित बनवास(उस समय की जैल) से लोटे तो लोगो ने दीवाली मनाई। उसके थोडे दिन बाद श्री रामचन्द्र जी ने एक धोबी का व्यंग्य सुनकर सीता को कलंकित कहके घर से निकाल दिया ............. पिता के राजा होते हुए जंगलो में बच्चे भटके। विधवा से भी बत्तर जिन्दगी होती है उस महिला की...........जो पतिव्रता होते हुए भी कलंकित कहलाए। अग्नि परीक्षा लेकर भी अपनी शंका को खत्म नहीं कर पाए एेसे भगवान रामचन्दर जिन्हे परिवारिक सुख तक नहीं मिला। अंत में अपने जीवन से दुखी होकर सरयु नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली। . इनको तो लोग भगवान माने बेठे है। और जो वास्तव मे भगवान है, उसका अपमान करते हैं। वो भगवान जिसका जीकर चार वेद, कुराण-पुराण, गीता, बाइबल, गुरूग्रंथ साहिब , कबीर सागर , सत ग्रंथ साहिब, सब पवित्र ग्रंथों मे है, जो सब सत ग्रंथों से परमात्मा सिद्ध हो चुके हैं वो कबीर परमेश्वर ही सच्चे भगवान हैं !!!!!! . जो जानबूझ साची तजै, करे झूठ से नेह। ताकी संगति हे प्रभू, सपने में भी ना दे।।

कबीर साहेब और काल की वार्ता


कबीर परमेश्वर ने जब सभी ब्रह्मण्डों की रचना कर ली और अपने लोक में विश्राम करने लगे। उसके बाद हम सभी काल के ब्रह्मण्ड में रह कर अपना किया हुआ कर्मदण्ड भोगने लगे और बहुत दुःखी रहने लगे। सुख व शांति की खोज में भटकने लगे और हमें अपने निज घर सतलोक की याद सताने लगी तथा वहां जाने के लिए भक्ति प्रारंभ की। किसी ने चारों वेदों को कंठस्थ किया तो कोई उग्र तप करने लगा और हवन यज्ञ, ध्यान, समाधि आदि क्रियाएं प्रारम्भ की, लेकिन अपने निज घर सतलोक नहीं जा सके क्योंकि उपरोक्त क्रियाएं करने से अगले जन्मों में अच्छे समृद्ध जीवन को प्राप्त होकर) जैसे राजा-महाराजा, बड़ा व्यापारी, अधिकारी, देव-महादेव, स्वर्ग-महास्वर्ग आदि (वापिस लख चैरासी भोगने लगे। बहुत परेशान रहने लगे और परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे कि हे दयालु ! हमें निज घर का रास्ता दिखाओ। हम हृदय से आपकी भक्ति करते हैं। आप हमें दर्शन क्यों नहीं दे रहे हो ? यह वृतान्त कबीर साहेब ने धर्मदास जी को बताते हुए कहा कि धर्मदास इन जीवों की पुकार सुनकर मैं अपने सतलोक से जोगजीत का रूप बनाकर काल लोक में आया। तब इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में जहां काल का निज घर है वहां पर तप्तशिला पर जीवों को भूनकर सुक्ष्म शरीर से गंध निकाला जा रहा था। मेरे पहुंचने के बाद उन जीवों की जलन समाप्त को गई। उन्होंने मुझे देखकर कहा कि हे पुरुष ! आप कौन हो? आपके दर्शन मात्रा से ही हमें बड़ा सुख व शांति का आभास हो रहा है। फिर मैंने बताया कि मैं पारब्रह्म परमेश्वर कबीर हूं। आप सब जीव मेरे लोक से आकर काल ब्रह्म के लोक में फंस गए हो। यह काल रोजाना एक लाख मानव के सुक्ष्म शरीर से गंध निकाल कर खाता है और बाद में नाना-प्रकार की योनियों में दण्ड भोगने के लिए छोड़ देता है। तब वे जीवात्माएं कहने लगी कि हे दयालु परमश्ेवर ! हमारे को इस काल की जेल से छुड़वाओ। मैंने बताया कि यह ब्रह्मण्ड काल ने तीन बार भक्ति करके मेरे से प्राप्त किए हुए हैं जो आप यहां सब वस्तुओं का प्रयोग कर रहे हो ये सभी काल की हैं और आप सब अपनी इच्छा से घूमने के लिए आए हो। इसलिए अब आपके ऊपर काल ब्रह्म का बहुत ज्यादा ऋण हो चुका है और वह ऋण मेरे सच्चे नाम के जाप के बिना नहीं उतर सकता। जब तक आप ऋण मुक्त नहीं हो सकते तब तक आप काल ब्रह्म की जेल से बाहर नहीं जा सकते। इसके लिए आपको मुझसे नाम उपदेश लेकर भक्ति करनी होगी। तब मैं आपको छुड़वा कर ले जाऊंगा। हम यह वार्ता कर ही रहे थे कि वहां पर काल ब्रह्म प्रकट हो गया और उसने बहुत क्रोधित होकर मेरे ऊपर हमला बोला। मैंने अपनी शब्द शक्ति से उसको मुर्छित कर दिया। फिर कुछ समय बाद वह हांेश में आया। मेरे चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा और बोला कि आप मुझ से बड़े हो, मुझ पर कुछ दया करो और यह बताओ कि आप मेरे लोक में क्यों आए हो ? तब मैंने काल पुरुष को बताया कि कुछ जीवात्माएं भक्ति करके अपने निज घर सतलोक में वापिस जाना चाहती हैं। उन्हें सतभक्ति मार्ग नहीं मिल रहा है। इसलिए वे भक्ति करने के बाद भी इसी लोक में रह जाती हैं। मैं उनको सतभक्ति मार्ग बताने के लिए और तेरा भेद देने के लिए आया हूं कि तूं काल है, एक लाख जीवों का आहार करता है और सवा लाख जीवों को उत्पन्न करता है तथा भगवान बन कर बैठा है। मैं इनको बताऊंगा कि तुम जिसकी भक्ति करते हो वह भगवान नहीं, काल है। इतना सुनते ही काल बोला कि यदि सब जीव वापिस चले गए तो मेरे भोजन का क्या होगा ? मैं भूखा मर जाऊंगा। आपसे मेरी प्रार्थना है कि तीन युगों में जीव कम संख्या में ले जाना और सबको मेरा भेद मत देना कि मैं काल हूं, सबको खाता हूं। जब कलियुग आए तो चाहे जितने जीवों को ले जाना। ये वचन काल ने मुझसे प्राप्त कर लिए। कबीर साहेब ने धर्मदास को आगे बताते हुए कहा कि सतयुग, त्रोतायुग, द्वापरयुग मंे भी मैं आया था और बहुत जीवों को सतलोक लेकर गया लेकिन इसका भेद नहीं बताया। अब मैं कलियुग में आया हूं और काल से मेरी वार्ता हुई है। काल ब्रह्म ने मुझ से कहा कि अब आप चाहे जितना जोर लगा लेना, आपकी बात कोई नहीं सुनेगा। प्रथम तो मैंने जीव को भक्ति के लायक ही नहीं छोड़ा है। उनमें बीड़ी, सिगरेट, शराब, मांस आदि दुव्र्यसन की आदत डाल कर इनकी वृत्ती को बिगाड़ दिया है। नाना-प्रकार की पाखण्ड पूजा में जीवात्माओं को लगा दिया है। दूसरी बात यह होगी कि जब आप अपना ज्ञान देकर वापिस अपने लोक में चले जाओगे तब मैं (काल) अपने दूत भेजकर आपके पंथ से मिलते-जुलते बारह पंथ चलाकर जीवों को भ्रमित कर दूंगा। महिमा सतलोक की बताएंगे, आपका ज्ञान कथेंगे लेकिन नाम-जाप मेरा करेंगे, जिसके परिणामस्वरूप मेरा ही भोजन बनेंगे। यह बात सुनकर कबीर साहेब ने कहा कि आप अपनी कोशिश करना, मैं सतमार्ग बताकर ही वापिस जाऊंगा और जो मेरा ज्ञान सुन लेगा वह तेरे बहकावे में कभी नहीं आएगा। सतगुरु कबीर साहेब ने कहा कि हे निरंजन ! यदि मैं चाहूं तो तेरे सारे खेल को क्षण भर में समाप्त कर सकता हूं परंतु ऐसा करने से मेरा वचन भंग होता है। यह सोच कर मैं अपने प्यारे हंसों को यथार्थ ज्ञान देकर शब्द का बल प्रदान करके सतलोक ले जाऊंगा और कहा कि - सुनो धर्मराया, हम संखों हंसा पद परसाया। जिन लीन्हा हमरा प्रवाना, सो हंसा हम किए अमाना।। (पवित्र कबीर सागर में जीवों को भूल-भूलइयां में डालने के लिए तथा अपनी भूख को मिटाने के लिए तरह-2 के तरीकों का वर्णन) द्वादस पंथ करूं मैं साजा, नाम तुम्हारा ले करूं अवाजा। द्वादस यम संसार पठहो, नाम तुम्हारे पंथ चलैहो।। प्रथम दूत मम प्रगटे जाई, पीछे अंश तुम्हारा आई।। यही विधि जीवनको भ्रमाऊं, पुरुष नाम जीवन समझाऊं।। द्वादस पंथ नाम जो लैहे, सो हमरे मुख आन समै है।। कहा तुम्हारा जीव नहीं माने, हमारी ओर होय बाद बखानै।। मैं दृढ़ फंदा रची बनाई, जामें जीव रहे उरझाई।। देवल देव पाषान पूजाई, तीर्थ व्रत जप-तप मन लाई।। यज्ञ होम अरू नेम अचारा, और अनेक फंद में डारा।। जो ज्ञानी जाओ संसारा, जीव न मानै कहा तुम्हारा।। (सतगुरु वचन) ज्ञानी कहे सुनो अन्याई, काटो फंद जीव ले जाई।। जेतिक फंद तुम रचे विचारी, सत्य शबद तै सबै बिंडारी।। जौन जीव हम शब्द दृढावै, फंद तुम्हारा सकल मुकावै।। चैका कर प्रवाना पाई, पुरुष नाम तिहि देऊं चिन्हाई।। ताके निकट काल नहीं आवै, संधि देखी ताकहं सिर नावै।। उपरोक्त विवरण से सिद्ध होता है कि जो अनेक पंथ चले हुए हैं। जिनके पास कबीर साहेब द्वारा बताया हुआ सतभक्ति मार्ग नहीं है, ये सब काल प्रेरित हैं। अतः बुद्धिमान को चाहिए कि सोच-विचार कर भक्ति मार्ग अपनांए क्योंकि मनुष्य जन्म अनमोल है, यह बार-बार नहीं मिलता। कबीर साहेब कहते हैं कि -- कबीर मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारम्बार। तरूवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर न लगता डारि।।

बुधवार, 4 मई 2016

बॉलीवुड ने भारत की दशा और दिशा दोनों ही बदल दी


बॉलीवुड ने भारत को इतना सब दिया है तभी तो आज देश यहाँ है ...! 1 बलात्कार गैंग रेप करने के तरीके 2 शादी हो रही लड़की को मंडप से भगाना 3 चोरी डकैती करने के तरीके धूम जेसी फ़िल्म 4 भारत के संस्कारो का मजाक बनाना 5 लड़कियो को छोटे अधनंगे कपडे पहने की सिख देना। औरजानकारी देना नारी केवल भोग की वस्तु है 6 दारू सिगरेट चरस गांजा कैसे पिया और लाया जाये 7 गुंडागर्दी कर के हफ्ता वसूली करना 8 भगवान का मज़ाक बनाना और अपमानित करना 9 भारतीयो को अंग्रेज की औलाद बनाना 10 भारतीय संस्कृति को मूर्खता पूर्ण बतानाऔर पश्चातीय संस्कृति को श्रेष्ठ बताना 11 माँ बाप को वृध्धाश्रम छोड़ के आना 12 गाय और भेंसो को मज़ाक बनाना और कुत्तो को उनसे श्रेष्ठबताना और पालना सिखाना 13 रोटी हरी सब्ज़ी खाना गलत बल्कि रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा बर्गरकोल्ड्रिंक और नॉन वेज खाना श्रेष्ठ है 14 चोटी रखना मूर्खता और फनी है मगर बालो के अजीबो गरीब स्टाइल(गजनी) रखना श्रेष्ठ है उसे आप सभ्य लगते है 15 शुद्ध हिन्दी या संस्कृत बोलना हास्य वाली होती है मूर्खो की भाषा पर अंग्रेंजी सर्वश्रेष्ठ भाषा है इसे आप ज्यदा समझदारऔर पढ़े लिखे लगते है 16 भगवान की आरती की जगह अश्लील गाने गाना अच्छा है इतना सब कुछ 30 सालो में बॉलीवुड ने भारत को दिया हे और अब ये सब देख के और सिख के इतने बुद्धिजीवी हो गए है क्या सही है और क्या गलत है इसमें भेद भी नहीं कर पातेऔर बगैर सर पैर की फिल्में इस देश में 500 करोड़ कमा जाती है इस देश का दुर्भाग्य देखिये बॉलीवुड के एक्टर, एक्टर्स और क्रिकेटर के जन्मदिवस पर देश भर की मिडिया और युवा पीढ़ी केक काटते है उन लोगो को भारत के असली शूरवीरो ,वीर वीरांगनाओ,ऋषि मुनियो.स्वामी विवेकानन्द,स्वामी दयानन्द सरस्वती,महाराणा प्रताप ,छत्रपति शिवाजी,झाँसी की रानी ,पृथ्वी राज चौहान,चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह के जन्म दिवस की तारीख भी याद नहीं है भारतीय संस्कृति सभ्यता और संस्कारो का पतन करने में सबसे बड़ा योगदान बॉलीवुड का रहा है।

परिभाषा स्वर्ग की

स्वर्ग की परिभाषाःःःःःःःःः स्वर्ग को एक होटल जैसा जानों। जिस तरह कोई धनी व्यक्ति गर्मियों के मौसम में शिमला या कुल्लु मनाली जैसे शहरो में ठंडे स्थान पर चला जाता है। वहां किसी होटल में ठहरता है। जिसमें कमरे का किराया व खाने का खर्चा अदा करना होता है। महीने में 30-40 हजार रूपए खर्च करके वापिस अपने कर्म क्षेत्र में आना होता है। फिर 11 महीने मजदूरी करो। फिर एक महीना घूम आओ। यदि किसी वर्ष कमाई अच्छी नहीं हुई तो उस एक महीने के सुख को भी तरसो। ठीक इसी प्रकार स्वर्ग जाने-- मनुष्य इस पृथ्वी लोक पर साधना करके कुछ समय स्वर्ग रूपी होटल में चला जाता है। अपनी पुण्य कमाई खर्च करके कुछ समय वहां रहकर वापिस नरक तथा चौरासी लाख प्राणियों के शरीर में कष्ट; पाप कर्मों के आधार पर भोगना पडता है। जब तक तत्वदर्शी संत नहीं मिलेगा तब तक जन्म-मृत्यु, स्वर्ग-नरक व 84 लाख योनियों का कष्ट बना ही रहेगा।क्योंकि केवल पूर्ण परमात्मा का सतनाम व सारनाम ही पापों का नाश करता है। अन्य प्रभुओं की पूजा से पाप नष्ट नहीं होते। सर्व कर्मों का ज्यों का त्यों फल ही मिलता है। साधना चैनल पर प्रतिदिन शाम 07ः40-08ः40 तक सतगुरू रामपाल जी महाराज के अमृत वचनों का आनन्द लें।

कबीर साहेब द्वारा कलयुग में आने का निर्धारित समय


पाँच सहस्र अरु पांचसौ, जब कलियुग बित जाय | महापुरुष फरमान तब, जग तारनको आय || हिन्दू तुर्क आदिक सबै, जेते जीव जहान | सत्य नामकी साख गहि, पावैं पद निर्बान || यथा सरितगण आपही, मिलैं सिंधु में धाय | सत्य सुकृत के मध्य तिमी, सबही पंथ समाय || जबलगि पूरण होए नहीं, ठीक का तिथि वार | कपट चातुरी तबहिलों, स्वसम वेद निरधार || सबहीं नारि नर शुद्ध तब, जब ठीक का दिन आवंत | कपट चातुरी छोड़ीके, शरण कबीर गहंत || एक अनेक हो गयो, पुनि अनेक हो एक | हंस चलै सतलोक सब, सत्यनाम की टेक || घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय | कलियुग इक है सोई, बरते सहज सुभाय || कहा उग्र कह छुद्र हो, हर सबकी भवभीर | सो समान समदृष्टि है, समरथ सत्य कबीर |

कबीर साहेब की वाणी में सृष्टि रचना


कबीर साहेब जी की अमृतवाणी में " सृष्टि रचना " धर्मदास यह जग बौराना। कोइ न जाने पद निरवाना।। अब मैं तुमसे कहों चिताई। त्रियदेवन की उत्पति भाई।। ज्ञानी सुने सो हिरदै लगाई। मूर्ख सुने सो गम्य ना पाई।। माँ अष्टंगी पिता निरंजन। वे जम दारुण वंशन अंजन।। पहिले कीन्ह निरंजन राई। पीछे से माया उपजाई।। धर्मराय किन्हाँ भोग विलासा। माया(दुर्गा) को रही तब आसा।। तीन पुत्र अष्टंगी जाये। ब्रम्हा विष्णु शिव नाम धराये।। तीन देव विस्त्तार चलाये। इनमें यह जग धोखा खाये।। तीन लोक अपने सुत दीन्हा। सुन्न निरंजन बासा लीन्हा।। अलख निरंजन सुन्न ठिकाना। ब्रम्हा विष्णु शिव भेद न जाना।। अलख निरंजन बड़ा बटपारा। तीन लोक जिव कीन्ह अहारा।। ब्रम्हा विष्णु शिव नहीं बचाये। सकल खाय पुन धूर उड़ाये।। तिनके सुत हैं तीनों देवा। आंधर जीव करत हैं सेवा।। तीनों देव और औतारा। ताको भजे सकल संसारा।। तीनों गुणका यह विस्त्तारा। धर्मदास मैं कहों पुकारा।। गुण तीनों की भक्ति में, भूल परो संसार। कहै कबीर निज नाम बिन, कैसे उतरें पार ॥ ........... Just Share .......... इन लिंक्स से अनमोल पुस्तक "ज्ञान गंगा" अब विभिन्न भाषाओं में Pdf फाइल डाउनलोड करे। =>ज्ञान गंगा हिन्दी भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_hindi.pdf (4.25mb) =>ज्ञान गंगा इगलिँश भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_english.pdf (3.07 mb) => ज्ञान गंगा पँजाबी भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_punjabi.pdf (4.29 mb) =>ज्ञान गंगा उर्दू भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_urdu.pdf (5.42mb) => ज्ञान गंगा गुजराती भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_gujarati.pdf (9.16mb) => ज्ञान गंगा उड़ीया भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_oriya.pdf (2.75mb) => ज्ञान गंगा असामी भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_assamese.pdf (2.92mb) => ज्ञान गंगा तेँलगू भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_telugu.pdf (2.36mb) => ज्ञान गंगा कनाडा भाषा मे www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_kannada.pdf (5.77mb) => ज्ञान गंगा नेपाली भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_nepali.pdf (4.91mb) => ज्ञान गंगा बँगाली भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_bengali.pdf (5.90mb) =>ज्ञान गंगा मराठी भाषा में www.jagatgururampalji.org/gyan_ganga_marathi.pdf (1.88mb) ऊपर दिए गए लिंक से बुक डाउनलोड करे ।। शेयर जरूर करे सभी भगत जी