रविवार, 17 अप्रैल 2016

एक ऐसा भक्त समाज सन्त रामपाल जी की अध्यक्षता में


परमेश्वर की रजा से "संत रामपाल जी एक ऐसा भक्त समाज तैयार कर रहे, है जिसको वास्तव में सभ्यता कहा जा सकता है, और हम खुश किस्मत है कि भारत ही वो देश बनेगा जिसका दुनिया में कोई जबाब नहीं होगा! ऐसा समाज जिस में सम्मिलित हर भक्त हर एक नियम का सम्मान करता है । जो उन चीजों को अपने दामन को छूने भी नहीं देता जो बुराई से भरपूर हों! "गम भी उन से आकर कहे भाई मुझे माफ करना में गलत जगह अपना घर बनाये बैठा हूँ" ऐसा समाज जिसमें हर एक नारी का सम्मान बनावटी नहीं,ऐसा समाज जिसमें पाप नहीं,ऐसा समाज जिसमें हर एक व्यक्ति के प्रति सभ्यता का परिचय देते है, कोई भी ऐसी वस्तु नहीं जो नशे से सम्बंध रखती है! भक्तों के पाँव में रहने के लायक भी नहीं,नशा लोगों को ऐसी ऐसी चीजें करवाता है! जिसे सोचकर लोंगों का दिल दहल जाता है, लेकिन संत रामपाल जी का भक्त समाज इस नशे को ऐसे लात मारता है,जैसे कोई फुटवाल हो,क्योंकि "कहता तो हर संत है नशा छोडो लेकिन छोडता कोई नहीं" ऐसे दिखाने के लिए आज जो भी लोग ये कह रहें है,वो ऐसे है वो वैसे हैे!"तो गौर से समझना इस बात को जो में कह रहा हूँ!"जैसे आप कोई भी चीज बाजार में खरीदने (कपडे,गहने,फ्रिज,कूलर,या कोई भी सामान)जाओ तो आप पहले पूछोगे भाई कितने का है! कैसा है कम्पनी का है या नहीं क्या आप बिना जाने बिना तहकीकात करें उसे खरीद सकते है! जाँचोंगें परखोगे तभी तो खरीदोगे"बस में इतना ही कहना चाहता हूँ कि पहले आप संत रामपाल को समझें,जाँचें वो क्या कह रहे है! और क्यों कह रहे है! आज भारत वर्ष में उनके ज्ञान का सामना करना किसी संत के बस की बात नहीं! १.जब मुसलमान धर्म के प्रवक्ता डा. जाकिर नायक ने विश्व के सभी धर्म गुरूओं को चुनौती दी थी के मेरे जैसा ज्ञान किसी के पास नहीं, और है तो' ज्ञान चर्चा करो मुझसे तब सभी संत कहाँ थे अपने आप को संत कहने वालों का ज्ञान कहाँ गया था!"उस समय भारत वर्ष में केवल एक संत रामपाल जी ने उसके चैलेंज को स्वीकार किया था! पर इसकी हिम्मत नहीं हुई ज्ञान चर्चा की । २.भारत के ये संत' भागवत कथा माँ के पेट से सीख कर नहीं आये! इन्हों ने पढा तो वेदों और गीता से है! पर ज्ञान हमें कुछ और दे रहे है और अपने आप को ज्ञानी कह रहे है!जबकि हमारे सदग्रन्थं तो कुछ और ही कह रहें है!आप भी सही ज्ञान समझ सकते है स्वयं पंडित साधारण इन्सान ही है!क्या हम में इतनी बुध्दी नहीं! ३.आज वो समय भी है समझाने वाला भी है,मनुष्य जन्म भी है,ऐसा मौका अपने हाथ से ना खोंये अपने इसी जीवन को सफल बनाये । छोडो इस लोक को जहाँ हमेशा ये जरा(वृध्द अवस्था) मरण (मृत्यु) बना रहेगा करोडों जन्म हो गये यहाँ भटकते हुए यहाँ सबकी दुर्गती बनी ही रहेगी!जैसे हम अपने घर को छोडकर कहीं बाहर चले जाये घूमने के लिए तो वहीं के नहीं हो जाते! हमें लौट कर अपने घर वापस जाना होता है! बस इसी प्रकार हमेें अपने घर वापिस लौटना है!क्योकिं बाहर कितना भी आदमी घूम ले उसे सुख अपने घर में ही मिलता है वो सुविधा अपने घर में ही मिलती है। "कबीर साहिब" "अमर करू सतलोक(अमरलोक)पठाऊँ" "तातें बंदी छोड़ कहाऊँ" सत् साहेब..

600 साल पहले कबीर साहेब ने क्या बताया


परमपिता परमात्मा सतगुरु हमें बताते हैं कि:- जब आज से ६०० वर्ष पहले इस कलयुग में स्वयं परमेश्वर कबीर साहेब आए थे तो उन्होने जो तत्व ग्यान हम तुच्छ जीवों को कहा/सुनाया था वह ज्यों की त्यों आज हमारे सभी सदग्रंथ समर्थन कर रहे हैं | परमेश्वर ने कहा था कि भक्ति अगर शास्त्रानुकूल न हो तो वह इस लोक व परलोक दोनो के लिए व्यर्थ है {गीता अ.१६ श्लोक २३-२४} और कहा था कि कबीर, तीन देवों की जो करते भक्ति | उनकी कभी न होवै मुक्ति || इस का प्रमाण (गीता अ.७ श्लोक१२-१५) आगे परमेश्वर ने बताया कि:- सब आए उस एक से, डार पात फल फूल | कबीरा पीछे क्या रहा, गही पकड़ा जब मूल || एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय | माली सिंचै मूल को तो, फूलै फलै अघाय || अक्षर पुरुष एक पेंड़ है,क्षर पुरुष वाकी डार | तीनों देवा शाखा हैं, पात रुप संसार || इन सभी पदों का उल्लेख पवित्र सदग्रंथ श्रीमदभगवत गीता अ.१५ श्लोक-१से४ व १६-१७ में ज्यों की त्यों मिलता है | जिससे प्रमाणित होता है कि उस समय जो यह तत्वग्यान परमेश्वर कबीर जी द्वारा बोला गया ऐसा ग्यान बताने वाला कोई संत इस धरा/२१ब्रंहांड में नहीं था क्यों कि इस संसार रुपी उल्टे लटके हूए वृक्ष को जड़ से पत्ते तक की व्याख्या कोई भी संत नही कर सका और गीता अ.१५ श्लोक-१ कहती है कि जो इस उल्टे लटके हूए संसाररुपी वृक्ष के सभी विभागों को तत्व से जानता है वह तत्वदर्शी संत है और गीता अ.४ श्लोक-३४ में गीता ग्यानदाता यह भी कहता है कि उस तत्वग्यान को तू तत्वदर्शी संत की शरण में जाकर उसके बताए अनुसार भक्ति कर | परमात्मा ने कहा है :- कबीर, बंधे को बंधा मिला, छूटे कौन उपाय | कर सेवा निरबंध की, वो पल में लेय छुड़ाय || वो तो स्वयं परमात्मा थे, तत्वदर्शी संत थे, निरबंध थे जो हमें सतभक्ति, सतसाधना बताकर यह सिध्द करके दिखाए कि हमें सिर्फ जड़/मूल (पूर्ण परमात्मा) की ही भक्ति साधना करनी चाहिए | वर्तमान में पूरण परमात्मा के उस सत भक्ति शास्त्रानुकूल साधना को बताने वाला इस धरा में केवल एक ही संत है- "जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज" आप वास्तव में परमात्मा / सतभक्ति / सतसाधना / मोक्ष पाना चाहते हैं तो सत्य को परखिए दुनिया की बातों में न आइये स्वयं जॉचिए अगर आप निष्पक्ष भाव व आत्म कल्याण को उद्देश्य रखकर सत्य को ढूँढेंगे तो परमात्मा आपको सत्य तक पहूँचने में मदद करेगा | बार बार ऐसा अवसर नही आता भक्तों पहचान लो इस संत स्वरुप परमात्मा को | इनके तत्वग्यान का उत्तर आज भी इस धरा में किसी संतों के पास नहीं है | इस तत्वग्यान को धारण करो और अपना कल्याण करो, परमात्मा कहते हैं- यह संसार समंझदा नाहीं, कहंदा शाम दोपहरे नूँ | गरीबदास ये वक्त जात है, रोवोगे इस पहरे नूँ || समझा है तो सिर धर पॉव | बहूर नहीं रे ऐसा दॉव || ||∆ सत साहेब ∆||

सत्गुरू पुरुष कबीर हैं


सत् साहेब सतगुरु देव की जय Kabir Is God- सतगुरु पुरुष कबीर हैं, चारों युग प्रवान। झूठे गुरुवा मर गए, हो गए भूत मसान।। -गरीबदास जी और संत सब कूप हैं, केते झरिता नीर। दादू अगम अपार है, दरिया सत्य कबीर।। -दादु दयाल जी वाणी अरबो खरवो, ग्रन्थ कोटी हजार। करता पुरुष कबीर, रहै नाभे विचार।। -नाभादास जी साहेब कबीर समर्थ है, आदी अन्त सर्व काल। ज्ञान गम्या से देदीया, कहै रैदास दयाल॥ -रैदास जी नौ नाथ चौरसी सिद्धा, इनका अन्धा ज्ञान। अवीचल ज्ञान कबीर का, यो गति विरला जान॥ -गोरखनाथ जी खालक आदम सिरजिआ आलम बडा कबीर॥ काइम दिइम कुदरती सिर पीरा दे पीर॥ सयदे (सजदे) करे खुदाई नू आलम बडा कबीर॥ -नानक जी बाजा बाजा रहितका, परा नगरमे शोर। सतगुरू खसम कबीर है, नजर न आवै और॥ -धर्मदास जी सन्त अनेक सन्सार मे, सतगुरू सत्य कबीर। जगजीवन आप कहत है, सुरती निरती के तीर॥ -जगजीवन जी तुम स्वामी मै बाल बुद्धि, भर्म कर्म किये नाश। कहै रामानन्द निज ब्रह्म तुम, हमरा दुढ विश्वास।। -रामानन्द जी कबीर इस संसार को, समझांऊ के बार । पूंछ जो पकङे भेड़ की, उतरया चाहे पार ॥ -कबीर साहेब** सत् साहेब..

पाखण्ड का अन्त


©कबीर की अन्धविश्वास, पाखंड, भेदभाव, जातिप्रथा, हिन्दू, मुस्लिम पर करारी चोट !!© ” जो तूं ब्रह्मण , ब्राह्मणी का जाया ! आन बाट काहे नहीं आया !! ” – कबीर (अर्थ- अपने आप को ब्राह्मण होने पर गर्व करने वाले ज़रा यह तो बताओ की जो तुम अपने आप की महान कहते तो फिर तुम किसी अन्य रास्ते से जाँ तरीके से पैदा क्यों नहीं हुआ ? जिस रास्ते से हम सब पैदा हुए हैं, तुम भी उसी रास्ते से ही क्यों पैदा हुए है ?) कोई आज यही बात बोलने की ‘हिम्मंत’ भी नहीं करता ओर कबीर सदियों पहले कह गए ।। हमे गर्व हैं की हम उस महान संत के अनुयाई हैं । ऐसे महान क्रांतिकारी संत को कोटी कोटि नमन !!! “लाडू लावन लापसी ,पूजा चढ़े अपार पूजी पुजारी ले गया,मूरत के मुह छार !!” – कबीर (अर्थ – आप जो भगवान् के नाम पर मंदिरों में दूध, दही, मख्कन, घी, तेल, सोना, चाँदी, हीरे, मोती, कपडे, वेज़- नॉनवेज़ , दारू-शारू, भाँग, मेकअप सामान, चिल्लर, चेक, केश इत्यादि माल जो चढाते हो, क्या वह बरोबर आपके भगवान् तक जा रहा है क्या ?? आपका यह माल कितना % भगवान् तक जाता है ? ओर कितना % बीच में ही गोल हो रहा है ? या फिर आपके भगवान तक आपके चड़ाए गए माल का कुछ भी नही पहुँचता ! अगर कुछ भी नही पहुँच रहा तो फिर घोटाला कहा हो रहा है ? ओर घोटाला कौन कर रहा है ? सदियों पहले दुनिया के इस सबसे बड़े घोटाले पर कबीर की नज़र पड़ी | कबीर ने बताया आप यह सारा माल ब्राह्मण पुजारी ले जाता है ,और भगवान् को कुछ नहीं मिलता, इसलिए मंदिरों में ब्राह्मणों को दान करना बंद करो ) ‪#‎अन्धविश्वास_पर_कबीर_की_चोट‬ !! ‪#‎हिन्दुओ_पर‬ ”पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!” – कबीर ”मुंड मुड़या हरि मिलें ,सब कोई लेई मुड़ाय | बार -बार के मुड़ते ,भेंड़ा न बैकुण्ठ जाय ||” – कबीर ”माटी का एक नाग बनाके, पुजे लोग लुगाया ! जिंदा नाग जब घर मे निकले, ले लाठी धमकाया !!” – कबीर ” जिंदा बाप कोई न पुजे, मरे बाद पुजवाये ! मुठ्ठी भर चावल लेके, कौवे को बाप बनाय !! – कबीर ”हमने देखा एक अजूबा ,मुर्दा रोटी खाए , समझाने से समझत नहीं ,लात पड़े चिल्लाये !!” – कबीर ‪#‎मुसलमानों_पर‬ ”कांकर पाथर जोरि के ,मस्जिद लई चुनाय | ता उपर मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय ||” – कबीर ‪#‎हिन्दू_मुस्लिम_दोनों_पर‬ ”हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना, आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना।” – कबीर (अर्थ : कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है. इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।) ‪#‎हिन्दुओ_की_जाति_पर_कबीर_की_चोट‬ ”जाति ना पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान ! मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान !! – कबीर ”काहे को कीजै पांडे छूत विचार। छूत ही ते उपजा सब संसार ।। हमरे कैसे लोहू तुम्हारे कैसे दूध। तुम कैसे बाह्मन पांडे, हम कैसे सूद।।” – कबीर ”कबीरा कुंआ एक हैं, पानी भरैं अनेक । बर्तन में ही भेद है, पानी सबमें एक ॥” – कबीर ”एक क्ष ,एकै मल मुतर, एक चाम ,एक गुदा । एक जोती से सब उतपना, कौन बामन कौन शूद ” – कबीर ‪#‎कबीर_की_सबको_सीख‬ ‪#‎बाकि_समझ_अपनी_अपनी‬ ”जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग I तेरा साईं तुझमें है , तू जाग सके तो जाग II ” – कबीर मोको कहाँ ढूंढे रे बन्दे , मैं तो तेरे पास में। ना मैं तीरथ में, ना मैं मुरत में, ना एकांत निवास में । ना मंदिर में , ना मस्जिद में, ना काबे , ना कैलाश में।। ना मैं जप में, ना मैं तप में, ना बरत ना उपवास में ।।। ना मैं क्रिया करम में, ना मैं जोग सन्यास में।। खोजी हो तो तुरंत मिल जाऊ, इक पल की तलाश में ।। कहत कबीर सुनो भई साधू, मैं तो तेरे पास में बन्दे… मैं तो तेरे पास में….. – कबीर

मीडिया कितना सच बोलता है


सबके लिए एक जरूरी संदेश... आप सभी जानते है कि Media में और Newspapers में एक बार जो बात आ गई, वो आग की तरह पूरी दुनिया में फैल जाती है ! Media कितना सच बोलता है, इसकी जाँच कोई नहीं करता, क्यूँकि सच कोई जानना नहीं चाहता, मेंहनत कौन करें, क्या करना सच जानकर Media ने जो कह दिया वो ही सच है, आजकल का पढा-लिखा समाज यही सोचता है, सच्चाई की तह तक कोई जाना नहीं चाहता !! मैं एक संत के बारे आपको कुछ बताना चाहूँगा, ये दुनिया में सबसे विवादित संत माने जाते हैं, वर्तमान में झूठा देशद्रोह का केस बनाकर इन्हे जेल भेज दिया गया है, Media ने झूठी खबरें बना-बनाकर इनको बदनाम करने की भरपूर कोशिश की है, दुनिया सच्चाई ना देखकर Media की बेतुकी और बिना सर-पैर की बातों में आकर उस संत को गालियाँ देती है, उनको भला-बुरा कहती है ! लेकिन कहते हैं ना कि सच को कुछ देर दबाया जा सकता है, लेकिन सच को झुठलाया नहीं जा सकता, सच एक दिन बाहर निकल के ही रहता है, वो दिन जल्द ही नजदीक आ रहा है, झूठ का पर्दाफाश होगा और सच सबके सामने होगा !! एक संत की पहचान उसके ज्ञान से होती है, उसकी दी गई शिक्षा के आधार से होती है, सदग्रन्थों में संत के बारे में लिखी पहचान से होती है, ना कि किसी Media या Newspaper की बकवास बातों से, Media अपनी TNP बढाने के लिए एक सच्चे इंसान को झूठा बना देता है और मूर्ख लोग Media को पूरा सच मान लेते हैं ! मैं आप सबसे हाथ जोडकर निवेदन करता हूँ, संत चाहे कोई भी हो उसकी पहचान केवल उसके ज्ञान से करो, किसी Media या Newspaper की बातों में आकर संत को गाली मत दो, क्या पता भगवान किस रूप में धरती पर बैठा हो और उसकी क्या लीला चल रही है कोई नहीं जान सकता !! संत की पहचान करनी है तो एक बार अपने सदग्रन्थों को ध्यान से देखो, धार्मिक किताबों को पढो, जिस संत का ज्ञान इनके अनुसार होगा वो सच्चा संत होगा ! आपके पास कोई भी सदग्रन्थ नहीं है और आप जानना चाहते हैं कि सभी धर्मों के धर्मग्रन्थ क्या कहते हैं, इनके क्या विचार हैं !! जानने के लिए अवश्य पढिये "" ज्ञान-गंगा"" पुस्तक ( इसमें सभी धर्मों के सदग्रन्थों श्रीमदभगवदगीता, चारों वेद, अठारह पुराण, बाईबिल, कुरान, गुरूग्रन्थसाहिब आदि का सारांश है, प्रमाण सहित ) आप सत्संग भी देख सकते हैं साधना चैनल शाम 07.40 से 08.40 तक आपको सारे सवालों का जबाव सत्संग के माध्यम से आपको मिलेगा !! 🙏🏻 🙏🏻 "" सत् साहेब जी ""🙏🏻🙏🏻

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

बिना गुरु के मोक्ष संभव नहीं


आखिर क्यूँ ?? कभी सोचा है आपने....?? हम मन्दिर जाते, मस्जिद जाते,चर्च जाते-- फिर भी दुखी 😔😔 हम सभी देवी-देवताओं को पूजते हैं-- फिर भी दुखी और घर में क्लेश 😔😔 हम गुरू भी बनाते हैं-- फिर भी कैंसर, टी.बी., स्वाइन फ्लू, एड्स, कोमा, पथरी, शुगर जैसी आदि खतरनाक बिमारियाँ हमें होती है 😔😔 हम दान भी देते हैं, जो हमारे बाह्मण-पंडित, काजी-मुल्ला बताते है, वो सब करते हैं-- फिर भी हमारी अकाल मौत और गरीबी से तंग, रोजी-रोटी को परेशान 😔😔 हमने व्रत किये, रोजे किये, तीर्थ किये, मक्का-मदीना किये-- फिर भी हमारी आँखों के सामने बाप से पहले बेटे-बेटी की अकाल मृत्यू, पत्नी से पहले पति की मृत्यू, दुर्घटना में पूरा परिवार ही खत्म..😔😔😭😭 Note:- कभी सोचा है:- क्यों होता है ऐसा....आखिर क्यों????? आखिर क्यूँ, आखिर क्यूँ ,आखिर क्यूँ ??????? क्यूँ, क्यूँ, क्यूँ ?????????? आप जानना चाहते हैं, इन सभी सवालों के जबाव...और जीवन की इन सभी समस्याओं से छुटकारा..अर्थात् मोक्ष तो अवश्य देखिये....साधना चैनल शाम 07.40 से 08.40 तक संत रामपाल जी महाराज के अमृत प्रवचन... Note:- संत जी के प्रवचन रोजाना जरूर देखे, क्यूँकि पहली बार देखने से जो शंकाएँ आपके मन में उठेंगी, उन सभी शंकाओं का समाधान प्रवचन रोजाना देखने पर ही होगा... सभी भगत आत्माओं से निवेदन है-- परमात्मा के इस Msg को Facebook, twitter,whtsapp, Newspaper etc. में ज्यादा से ज्यादा Share करें ! सत् साहेब जी..🙏🏻🙏🏻

माता के नवरात्रि

माता की नवरात्रि ,,, जी हाँ पूरे भारत में माता के नवरात्रों का दौर चल रहा है और भोला भला समाज व्रत और जागरण करवा कर अपने उद्धार की सोच रहा हैं पर आप को एक बात बता दें कि इस तरह से आपका उद्धार हो या ना हो पर नकली पुजारियों , पांडो का उद्धार जरूर है, शायद आपको बुरा लगे पर एक बार पोस्ट को पूरा पढ़ लें फिर विचार करें I ,,, हमारे कल्याण का मार्ग हमारे धर्म ग्रंथो और शास्त्रों में लिखा है और गीता जी के अध्याय न. 16 के श्लोक 23 में सपष्ट लिखा हैं कि अर्जुन शास्त्र विधि को त्याग कर जो लोग मनमाना आचरण करते हैं उन्हें कोई लाभ नहीं होता और विचार करने की बात भी हैं कि इन पुजारियों द्वारा प्राचीन काल से ही नवरात्रे और ना जाने कौन कौन से व्रत रखवाएं जा रहे हैं पर ना तो मेरे भारत देश में उन्नति हुयी हैं और ना गरीब का भला हुआ हैं बल्कि और भी ज्यादा पतन हो गया है I , आप सभी अपने आप को पढ़ा लिखा मानते हो बाजार से सब्जी भी लाते हो तो विचार करते हो कि ये खराब न हो तो फिर भगती मार्ग में इतनी सुस्ती क्यूँ कोई जैसा कह देता है कर देते हो विचार करने वाली बात है हमारे पवित्र ग्रन्थ गीता में अर्जुन को श्री कृष्ण जी कहते हैं कि : ,,,, अर्जुन न तो ज्यादा खाने वाले का और न ही बिलकुल न खाने वाले का , और न ज्यादा सोने वाले का और नही ज्यादा जागने वाले का ये योग सफल होता हैं तो फिर व्रत किस लिए I ,,,, एक बात और नवरात्रे तो 9 दिन के होते हैं पर साल में 365 दिन होते हैं बाकी के दिन वो माँ को कैसे मनाते हो और यहाँ तक कि कुछ मुर्ख तो ऐसे हैं सारा साल शराब पीते हैं और इन दिनों में अपने आप को महा ज्ञानी समझ बैठते हैं ये कोई बात हैं I ,,, नानक जी ने गुरु ग्रन्थ साहेब में लिखा हैं कि रखे व्रत ते छोड़े अन्न , ना ओह सुहागन न ओह रन्न II यानी व्रत रखने वाले और अन्न छोड़ने वाले पाखंडी हैं उन्हें भगवान् से क्या लेना ,,,, यहाँ तक कि महात्मा वुद्ध जैसे महापुरुषों ने बारह साल तक व्रत रखा और अंत में एक ही बात बोली : STARVATION COULD NOT LEAD TO SALVATION भूखा मरने से उद्धार नहीं होता I इसलिए मैं अपने पढ़े लिखे भाई बहनों से उम्मीद करता हूँ कि वो इस विषय में सोचे अपने ग्रंथो को पढ़े अगर आप वास्तव में शिक्षित है तो सोचें और अगर नहीं हैं तो किसी पढ़े लिखे से पूछ लें I सत साहेब II

रविवार, 27 मार्च 2016

पुरी में जगन्नाथ का मन्दिर कैसे बना ?


Kabir Sahib पुरी में श्री जगन्नाथ जी का मन्दिर अर्थात् धाम कैसे बना Updated: January 20th, 2016 | Tags: Kabir Sahib, Jagan Nath, Puri, Odisha उड़ीसा प्रांत में एक इन्द्रदमन नाम का राजा था। वह भगवान श्री कृष्ण जी का अनन्य भक्त था। एक रात्राी को श्री कृष्ण जी ने राजा को स्वपन में दर्शन देकर कहा कि जगन्नाथ नाम से मेरा एक मन्दिर बनवा दे। श्री कृष्ण जी ने यह भी कहा था कि इस मन्दिर में मूर्ति पूजा नहीं करनी है। केवल एक संत छोड़ना है जो दर्शकों को पवित्रा गीता अनुसार ज्ञान प्रचार करे। समुद्र तट पर वह स्थान भी दिखाया जहाँ मन्दिर बनाना था। सुबह उठकर राजा इन्द्रदमन ने अपनी पत्नी को बताया कि आज रात्राी को भगवान श्री कृष्ण जी दिखाई दिए। मन्दिर बनवाने के लिए कहा है। रानी ने कहा शुभ कार्य में देरी क्या? सर्व सम्पत्ति उन्हीं की दी हुई है। उन्हीं को समर्पित करने में क्या सोचना है? राजा ने उस स्थान पर मन्दिर बनवा दिया जो श्री कृष्ण जी ने स्वपन में समुद्र के किनारे पर दिखाया था। मन्दिर बनने के बाद समुद्री तुफान उठा, मन्दिर को तोड़ दिया। निशान भी नहीं बचा कि यहाँ मन्दिर था। ऐसे राजा ने पाँच बार मन्दिर बनवाया। पाँचों बार समुद्र ने तोड़ दिया। राजा ने निराश होकर मन्दिर न बनवाने का निर्णय ले लिया। यह सोचा कि न जाने समुद्र मेरे से कौन-से जन्म का प्रतिशोध ले रहा है। कोष रिक्त हो गया, मन्दिर बना नहीं। कुछ समय उपरान्त पूर्ण परमेश्वर (कविर्देव) ज्योति निरंजन (काल) को दिए वचन अनुसार राजा इन्द्रदमन के पास आए तथा राजा से कहा आप मन्दिर बनवाओ। अब के समुद्र मन्दिर (महल) नहीं तोड़ेगा। राजा ने कहा संत जी मुझे विश्वास नहीं है। मैं भगवान श्री कृष्ण (विष्णु) जी के आदेश से मन्दिर बनवा रहा हूँ। श्री कृष्ण जी समुद्र को नहीं रोक पा रहे हैं। पाँच बार मन्दिर बनवा चुका हूँ, यह सोच कर कि कहीं भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हों। परन्तु अब तो परीक्षा देने योग्य भी नहीं रहा हूँ क्योंकि कोष भी रिक्त हो गया है। अब मन्दिर बनवाना मेरे वश की बात नहीं। परमेश्वर ने कहा इन्द्रदमन जिस परमेश्वर ने सर्व ब्रह्मण्डांे की रचना की है, वही सर्व कार्य करने में सक्षम है, अन्य प्रभु नहीं। मैं उस परमेश्वर की वचन शक्ति प्राप्त हूँ। मैं समुद्र को रोक सकता हूँ (अपने आप को छुपाते हुए सत कह रहे थे)। राजा ने कहा कि संत जी मैं नहीं मान सकता कि श्री कृष्ण जी से भी कोई प्रबल शक्ति युक्त प्रभु है। जब वे ही समुद्र को नहीं रोक सके तो आप कौन से खेत की मूली हो। मुझे विश्वास नहंी होता तथा न ही मेरी वितिय स्थिति मन्दिर (महल) बनवाने की है। संत रूप में आए कविर्देव (कबीर परमेश्वर) ने कहा राजन् यदि मन्दिर बनवाने का मन बने तो मेरे पास आ जाना मैं अमूक स्थान पर रहता हूँ। अब के समुद्र मन्दिर को नहीं तोड़ेगा। यह कह कर प्रभु चले आए। उसी रात्राी में प्रभु श्री कृष्ण जी ने फिर राजा इन्द्रदमन को दर्शन दिए तथा कहा इन्द्रदमन एक बार फिर महल बनवा दे। जो तेरे पास संत आया था उससे सम्पर्क करके सहायता की याचना कर ले। वह ऐसा वैसा संत नहीं है। उसकी भक्ति शक्ति का कोई वार-पार नहीं है। राजा इन्द्रदमन नींद से जागा, स्वपन का पूरा वृतान्त अपनी रानी को बताया। रानी ने कहा प्रभु कह रहे हैं तो आप मत चुको। प्रभु का महल फिर बनवा दो। रानी की सद्भावना युक्त वाणी सुन कर राजा ने कहा अब तो कोष भी खाली हो चुका है। यदि मन्दिर नहीं बनवाऊंगा तो प्रभु अप्रसन्न हो जायेंगे। मैं तो धर्म संकट में फंस गया हूँ। रानी ने कहा मेरे पास गहने रखे हैं। उनसे आसानी से मन्दिर बन जायेगा। आप यह गहने लो तथा प्रभु के आदेश का पालन करो, यह कहते हुए रानी ने सर्व गहने जो घर रखे थे तथा जो पहन रखे थे निकाल कर प्रभु के निमित अपने पति के चरणों में समर्पित कर दिये। राजा इन्द्रदमन उस स्थान पर गया जो परमेश्वर ने संत रूप में आकर बताया था। कबीर प्रभु अर्थात् अपरिचित संत को खोज कर समुद्र को रोकने की प्रार्थना की। प्रभु कबीर जी (कविर्देव) ने कहा कि जिस तरफ से समुद्र उठ कर आता है, वहाँ समुद्र के किनारे एक चैरा (चबूतरा) बनवा दे। जिस पर बैठ कर मैं प्रभु की भक्ति करूंगा तथा समुद्र को रोकूंगा। राजा ने एक बड़े पत्थर को कारीगरों से चबूतरा जैसा बनवाया, परमेश्वर कबीर उस पर बैठ गए। छटी बार मन्दिर बनना प्रारम्भ हुआ। उसी समय एक नाथ परम्परा के सिद्ध महात्मा आ गए। नाथ जी ने राजा से कहा राजा बहुत अच्छा मन्दिर बनवा रहे हो, इसमें मूर्ति भी स्थापित करनी चाहिए। मूर्ति बिना मन्दिर कैसा? यह मेरा आदेश है। राजा इन्द्रदमन ने हाथ जोड़ कर कहा नाथ जी प्रभु श्री कृष्ण जी ने मुझे स्वपन में दर्शन दे कर मन्दिर बनवाने का आदेश दिया था तथा कहा था कि इस महल में न तो मूर्ति रखनी है, न ही पाखण्ड पूजा करनी है। राजा की बात सुनकर नाथ ने कहा स्वपन भी कोई सत होता है। मेरे आदेश का पालन कीजिए तथा चन्दन की लकड़ी की मूर्ति अवश्य स्थापित कीजिएगा। यह कह कर नाथ जी बिना जल पान ग्रहण किए उठ गए। राजा ने डर के मारे चन्दन की लकड़ी मंगवाई तथा कारीगर को मूर्ति बनाने का आदेश दे दिया। एक मूर्ति श्री कृष्ण जी की स्थापित करने का आदेश श्री नाथ जी का था। फिर अन्य गुरुओं-संतों ने राजा को राय दी कि अकेले प्रभु कैसे रहेंगे? वे तो श्री बलराम को सदा साथ रखते थे। एक ने कहा बहन सुभद्रा तो भगवान श्री कृष्ण जी की लाड़ली बहन थी, वह कैसे अपने भाई बिना रह सकती है? तीन मूर्तियाँ बनवाने का निर्णय लिया गया। तीन कारीगर नियुक्त किए। मूर्तियाँ तैयार होते ही टुकड़े-टुकड़े हो गई। ऐसे तीन बार मूर्तियाँ खण्ड हो गई। राजा बहुत चिन्तित हुआ। सोचा मेरे भाग्य में यह यश व पुण्य कर्म नहीं है। मन्दिर बनता है वह टूट जाता है। अब मूर्तियाँ टूट रही हैं। नाथ जी रूष्ट हो कर गए हैं। यदि कहूँगा कि मूर्तियाँ टूट जाती हैं तो सोचेगा कि राजा बहाना बना रहा है, कहीं मुझे शाप न दे दे। चिन्ता ग्रस्त राजा न तो आहार कर रहा है, न रात्राी भर निन्द्रा आई। सुबह बेचैन अवस्था में राज दरबार में गया। उसी समय पूर्ण परमात्मा (कविर्देव) कबीर प्रभु एक अस्सी वर्षीय कारीगर का रूप बनाकर राज दरबार में उपस्थित हुआ। कमर पर एक थैला लटकाए हुए था जिसमें आरी बाहर स्पष्ट दिखाई दे रही थी, मानों बिना बताए कारीगर का परिचय दे रही थी तथा अन्य बसोला व बरमा आदि थेले में भरे थे। कारीगर वेश में प्रभु ने राजा से कहा मैंने सुना है कि प्रभु के मन्दिर के लिए मूर्तियाँ पूर्ण नहीं हो रही हैं। मैं 80 वर्ष का वृद्ध हो चुका हूँ तथा 60 वर्ष का अनुभव है। चन्दन की लकड़ी की मूर्ति प्रत्येक कारीगर नहीं बना सकता। यदि आप की आज्ञा हो तो सेवक उपस्थित है। राजा ने कहा कारीगर आप मेरे लिए भगवान ही कारीगर बन कर आये लगते हो। मैं बहुत चिन्तित था। सोच ही रहा था कि कोई अनुभवी कारीगर मिले तो समस्या का समाधान बने। आप शीघ्र मूर्तियाँ बना दो। वृद्ध कारीगर रूप में आए कविर्देव 1⁄4कबीर प्रभु1⁄2 ने कहा राजन मुझे एक कमरा दे दो, जिसमें बैठ कर प्रभु की मूर्ति तैयार करूंगा। मैं अंदर से दरवाजा बंद करके स्वच्छता से मूर्ति बनाऊंगा। ये मूर्तियां जब तैयार हो जायेंगी तब दरवाजा खुलेगा, यदि बीच में किसी ने खोल दिया तो जितनी मूर्तियाँ बनेगी उतनी ही रह जायेंगी। राजा ने कहा जैसा आप उचित समझो वैसा करो। बारह दिन मूर्तियाँ बनाते हो गए तो नाथ जी आ गए। नाथ जी ने राजा से पूछा इन्द्रदमन मूर्तियाँ बनाई क्या? राजा ने कर बद्ध हो कर कहा कि आप की आज्ञा का पूर्ण पालन किया गया है महात्मा जी। परन्तु मेरा दुर्भाग्य है कि मूर्तियाँ बन नहीं पा रही हैं। आधी बनते ही टुकड़े-टुकड़े हो जाती हैं नौकरों से मूर्तियों के टुकड़े मंगवाकर नाथ जी को विश्वास दिलाने के लिए दिखाए। नाथ जी ने कहा कि मूर्ति अवश्य बनवानी है। अब बनवाओं मैं देखता हूँ कैसे मूर्ति टूटती है। राजा ने कहा नाथ जी प्रयत्न किया जा रहा है। प्रभु का भेजा एक अनुभवी 80 वर्षीय कारीगर बन्द कमरें में मूर्ति बना रहा है। उसने कहा है कि मूर्तियाँ बन जाने पर मैं अपने आप द्वार खोल दूंगा। यदि किसी ने बीच में द्वार खोल दिया तो जितनी मूर्तियाँ बनी होंगी उतनी ही रह जायेंगी। आज उसे मूर्ति बनाते बारह दिन हो गये। न तो बाहर निकला है, न ही जल पान तथा आहार ही किया है। नाथ जी ने कहा कि मूर्तियाँ देखनी चाहिये, कैसी बना रहा है? बनने के बाद क्या देखना है। ठीक नहीं बनी होंगी तो ठीक बनायेंगे। यह कहकर नाथ जी राजा इन्द्रदमन को साथ लेकर उस कमरे के सामने गए जहाँ मूर्ति बनाई जा रही थी तथा आवाज लगाई कारीगर द्वार खोलो। कई बार कहा परन्तु द्वार नहीं खुला तथा जो खट-खट की आवाज आ रही थी, वह भी बन्द हो गई। नाथ जी ने कहा कि 80 वर्षीय वृद्ध बता रहे हो, बारह दिन खाना-पिना भी नहीं किया है। अब आवाज भी बंद है, कहीं मर न गया हो। धक्का मार कर दरवाजा तोड़ दिया, देखा तो तीन मूर्तियाँ रखी थी, तीनों के हाथ के व पैरों के पंजे नहीं बने थे। कारीगर अन्तध्र्यान था। मन्दिर बन कर तैयार हो गया और चारा न देखकर अपने हठ पर अडिग नाथ जी ने कहा ऐसी ही मूर्तियों को स्थापित कर दो, हो सकता है प्रभु को यही स्वीकार हो, लगता है श्री कृष्ण ही स्वयं मूर्तियां बना कर गए हैं। मुख्य पांडे ने शुभ मूहूर्त निकाल कर अगले दिन ही मूर्तियों की स्थापना कर दी। सर्व पाण्डे तथा मुख्य पांडा व राजा तथा सैनिक व श्रद्धालु मूर्तियों में प्राण स्थापना करने के लिए चल पड़े। पूर्ण परमेश्वर 1⁄4कविर्देव1⁄2 एक शुद्र का रूप धारण करके मन्दिर के मुख्य द्वार के मध्य में मन्दिर की ओर मुख करके खड़े हो गए। ऐसी लीला कर रहे थे मानों उनको ज्ञान ही न हो कि पीछे से प्रभु की प्राण स्थापना की सेना आ रही है। आगे-आगे मुख्य पांडा चल रहा था। परमेश्वर फिर भी द्वार के मध्य में ही खड़े रहे। निकट आ कर मुख्य पांडे ने शुद्र रूप में खड़े परमेश्वर को ऐसा धक्का मारा कि दूर जा कर गिरे तथा एकान्त स्थान पर शुद्र लीला करते हुए बैठ गए। राजा सहित सर्व श्रद्धालुओं ने मन्दिर के अन्दर जा कर देखा तो सर्व मूर्तियाँ उसी द्वार पर खड़े शुद्र रूप परमेश्वर का रूप धारण किए हुए थी। इस कौतूक को देखकर उपस्थित व्यक्ति अचम्भित हो गए। मुख्य पांडा कहने लगा प्रभु क्षुब्ध हो गया है क्योंकि मुख्य द्वार को उस शुद्र ने अशुद्ध कर दिया है। इसलिए सर्व मूर्तियों ने शुद्र रूप धारण कर लिया है। बड़ा अनिष्ठ हो गया है। कुछ समय उपरान्त मूर्तियों का वास्तविक रूप हो गया। गंगा जल से कई बार स्वच्छ करके प्राण स्थापना की गई। {कविर्देव ने कहा अज्ञानता व पाखण्ड वाद की चरम सीमा देखें। कारीगर मूर्ति का भगवान बनता है। फिर पूजारी या अन्य संत उस मूर्ति रूपी प्रभु में प्राण डालता है अर्थात् प्रभु को जीवन दान देता है। तब वह मिट्टी या लकड़ी का प्रभु कार्य सिद्ध करता है, वाह रे पाखण्डियों खूब मूर्ख बनाया प्रभु प्रेमी आत्माओं को।} मूर्ति स्थापना हो जाने के कुछ दिन पश्चात् लगभग 40 फूट ऊँचा समुद्र का जल उठा जिसे समुद्री तुफान कहते हैं तथा बहुत वेग से मन्दिर की ओर चला। सामने कबीर परमेश्वर चैरा (चबुतरे) पर बैठे थे। अपना एक हाथ उठाया जैसे आशीर्वाद देते हैं, समुद्र उठा का उठा रह गया तथा पर्वत की तरह खड़ा रहा, आगे नहीं बढ़ सका। विप्र रूप बना कर समुद्र आया तथा चबूतरे पर बैठे प्रभु से कहा कि भगवन आप मुझे रास्ता दे दो, मैं मन्दिर तोड़ने जाऊंगा। प्रभु ने कहा कि यह मन्दिर नहीं है। यह तो महल 1⁄4आश्रम1⁄2 है। इस में विद्वान पुरुष रहा करेगा तथा पवित्र गीता जी का ज्ञान दिया करेगा। आपका इसको विधवंश करना शोभा नहीं देता। समुद्र ने कहा कि मैं इसे अवश्य तोडूंगा। प्रभु ने कहा कि जाओ कौन रोकता है? समुद्र ने कहा कि मैं विवश हो गया हूँ। आपकी शक्ति अपार है। मुझे रस्ता दे दो प्रभु। परमेश्वर कबीर साहेब जी ने पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हो? विप्र रूप में उपस्थित समुद्र ने कहा कि जब यह श्री कृष्ण जी त्रोतायुग में श्री रामचन्द्र रूप में आया था तब इसने मुझे अग्नि बाण दिखा कर बुरा भला कह कर अपमानित करके रास्ता मांगा था। मैं वह प्रतिशोध लेने जा रहा हूँ। परमेश्वर कबीर जी ने कहा कि प्रतिशोध तो आप पहले ही ले चुके हो। आपने द्वारिका को डूबो रखा है। समुद्र ने कहा कि अभी पूर्ण नहीं डूबा पाया हूँ, आधी रहती है। वह भी कोई प्रबल शक्ति युक्त संत सामने आ गया था जिस कारण से मैं द्वारिका को पूर्ण रूपेण नहीं समा पाया। अब भी कोशिश करता हूँ तो उधर नहीं जा पा रहा हूँ। उधर से मुझे बांध रखा है। तब परमेश्वर कबीर (कविर्देव) ने कहा वहाँ भी मैं ही पहुँचा था। मैंने ही वह अवशेष बचाया था। अब जा शेष बची द्वारिका को भी निगल ले, परन्तु उस यादगार को छोड़ देना, जहाँ श्री कृष्ण जी के शरीर का अन्तिम संस्कार किया गया था (श्री कृष्ण जी के अन्तिम संस्कार स्थल पर बहुत बड़ा मन्दिर बना दिया गया। यह यादगार प्रमाण बना रहेगा कि वास्तव में श्री कृष्ण जी की मृत्यु हुई थी तथा पंच भौतिक शरीर छोड़ गये थे। नहीं तो आने वाले समय में कहेंगे कि श्री कृष्ण जी की तो मृत्यु ही नहीं हुई थी)। आज्ञा प्राप्त कर शेष द्वारिका को भी समुद्र ने डूबो लिया। परमेश्वर कबीर जी (कविर्देव) ने कहा अब आप आगे से कभी भी इस जगन्नाथ मन्दिर को तोड़ने का प्रयत्न नहीं करना तथा इस महल से दूर चला जा। ऐसी आज्ञा प्रभु की मान कर प्रणाम करके मन्दिर से दूर लगभग डेढ़ किलोमीटर हट गया। ऐसे श्री जगन्नाथ जी का मन्दिर अर्थात् धाम स्थापित हुआ। श्री जगन्नाथ के मन्दिर में छुआछात प्रारम्भ से ही नहीं है कुछ दिन पश्चात जिस पांडे ने प्रभु कबीर जी को शुद्र रूप में धक्का मारा था उसको कुष्ट रोग हो गया। सर्व औषधी करने पर भी स्वस्थ नहीं हुआ। कुष्ट रोग का कष्ट अधिक से अधिक बढ़ता ही चला गया। सर्व उपासनायें भी की, श्री जगन्नाथ जी से रो-रोकर संकट निवार्ण के लिए प्रार्थना की, परन्तु सर्व निष्फल रही। स्वपन में श्री कृष्ण जी ने दर्शन दिए तथा कहा पांडे उस संत के चरण धोकर चरणामृत पान कर जिसको तुने मन्दिर के मुख्य द्वार पर धक्का मारा था। तब उसके आशीर्वाद से तेरा कुष्ट रोग ठीक हो सकता है। यदि उसने तुझे हृदय से क्षमा किया तो, अन्यथा नहीं। मरता क्या नहीं करता? वह मुख्य पांडा सवेरे उठा। कई सहयोगी पांडों को साथ लेकर उस स्थान पर गया जहाँ पर प्रभु कबीर शूद्र रूप में विराजमान थे। ज्यों ही पांडा प्रभु के निकट आया तो परमेश्वर उठ कर चल पड़े तथा कहा हे पांडा मैं तो अछूत हूँ मेरे से दूर रहना, कहीं आप अपवित्रा न हो जायें। पांडा निकट पहुँचा, परमेश्वर और आगे चल पड़े। तब पांडा फूट-फूट कर रोने लगा तथा कहा परवरदीगार मेरा दोष क्षमा कर दो। तब दयालु प्रभु रूक गए। पांडे ने आदर के साथ एक स्वच्छ वस्त्र जमीन पर बिछा कर प्रभु को बैठने की प्रार्थना की। प्रभु उस वस्त्र पर बैठ गए। तब उस पांडे ने स्वयं चरण धोए तथा चरणामृत को पात्रा में वापिस डाल लिया। प्रभु कबीर जी ने कहा पांडे चालीस दिन तक इसे पीना भी तथा स्नान करने वाले जल में कुछ डाल कर स्नान करते रहना। चालीसवें दिन तेरा कुष्ट रोग समाप्त होगा तथा कहा कि भविष्य में भी इस जगन्नाथ जी के मन्दिर में किसी ने छूआछात किया तो उसको भी दण्ड मिलेगा। सर्व उपस्थित व्यक्तियों ने वचन किए कि आज के बाद इस पवित्रा स्थान पर कोई छुआ-छात नहीं की जायेगी। विचार करें:- हिन्दुस्तान का एक ही मन्दिर ऐसा है जिसमें प्रारम्भ से ही छूआ-छात नहीं रही है। मुझ दास को भी उस स्थान को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। कई सेवकों के साथ उस स्थल को देखने के लिए गया था कि कुछ प्रमाण प्राप्त करूं। वहाँ पर सर्व प्रमाण आज भी साक्षी मिले। जिस पत्थर (चैरा) पर बैठ कर कबीर परमेश्वर जी ने मन्दिर को बचाने के लिए समुद्र को रोका था वह आज भी विद्यमान है। उसके ऊपर एक यादगार रूप में गुमज बना रखा है। वहाँ पर बहुत पुरातन महन्त (रखवाला) परम्परा से एक आश्रम भी विद्यमान है। वहाँ पर लगभग 70 वर्षीय वृद्ध महन्त जी से उपरोक्त मन्दिर की समुद्र से रक्षा की जानकारी चाही तो उसने भी यही बताया तथा कहा कि मेरे पूर्वज कई पीढ़ी से यहाँ पर महन्त (रखवाले) रहे हैं। यहाँ पर ही श्री धर्मदास साहेब व उनकी पत्नी भक्तमति आमनी देवी ने शरीर त्यागा था। दोनों की समाधियाँ भी साथ-साथ बनी दिखाई। फिर हम श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में गए। वहाँ पर मूर्ति पूजा आज भी नहीं है। परन्तु प्रदर्शनी अवश्य लगा रखी है। जो तीन मूर्तियाँ भगवान श्री कृष्ण जी तथा श्री बलराम जी व बहन सुभद्रा जी की मन्दिर के अन्दर स्थापित हैं उनके दोनों हाथों के पंजे नहीं हैं, दोनों हाथ टूंडे हैं। उन मूर्तियों की भी पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी हैं। वहाँ पर एक गाईड पांडे से पूछा कि सुना है कि यह मन्दिर पाँच बार समुद्र ने तोड़ा था पुनर बनवाया था। समुद्र ने क्यों तोड़ा? फिर किसने समुद्र को रोका। पांडे ने कहा इतना तो मुझे पता नहीं। यह सर्व कृपा जगन्नाथ जी की थी, उन्होंने ही समुद्र को रोका था, सुना तो है कि समुद्र ने तीन बार मन्दिर को तोड़ा था। मैंने फिर प्रश्न किया कि प्रथम वार ही क्यों न समुद्र रोका प्रभु ने। पांडे ने उत्तर दिया कि लीला है जगन्नाथ की। मैंने फिर पूछा कि इस मन्दिर में छूआछात है या नहीं? उसने कहा जब से मन्दिर बना है यहाँ कोई छूआछात नहीं है। मन्दिर में शुद्र तथा पांडा एक थाली या पतल में खाना खा सकते हैं कोई मना नहीं करता। मैंने प्रश्न किया पांडे जी अन्य हिन्दु मन्दिरों में तो पहले बहुत छुआछात थी, इसमें क्यों नहीं? प्रभु तो वही है। पांडे का उतर था लीला है जगन्नाथ की। अब पुण्यात्माऐं विचार करें कि सत को कितना दबाया गया है, एक लीला जगन्नाथ की कह कर। पवित्र यादगारें आदरणीय हैं, परन्तु आत्म कल्याण तो केवल पवित्रा गीता जी व पवित्रा वेदों में वर्णित तथा परमेश्वर कबीर जी द्वारा दिए तत्वज्ञान के अनुसार भक्ति साधना करने मात्रा से ही सम्भव है, अन्यथा शास्त्र विरुद्ध होने से मानव जीवन व्यर्थ हो जाएगा। प्रमाण गीता अध्याय 16 मंत्र 23-24। श्री जगन्नाथ के मन्दिर में प्रभु के आदेशानुसार पवित्रा गीता जी के ज्ञान की महिमा का गुणगान होना ही श्रेयकर है तथा जैसा श्रीमद्भगवत गीता जी में भक्ति विधि है उसी प्रकार साधना करने मात्रा से ही आत्म कल्याण संभव है, अन्यथा जगन्नाथ जी के दर्शन मात्रा या खिचड़ी प्रसाद खाने मात्रा से कोई लाभ नहीं, क्योंकि यह क्रिया श्री गीता जी में वर्णित न होने से शास्त्रा विरुद्ध हुई, जो अध्याय 16 मंत्र 23 - 24 में प्रमाण है।

who is husband of durga????


दुर्गा अम्बिका अंबे अषटान्गी आदिमाया महामाया प्रकृति देवी त्रिदेव जननी यानी त्रिदेव ब्रह्मा-विश्नु-शिव को जन्म देने वाली के भक्त तो पूरे भारत में पाए जाते हैं लेकिन सही भक्त बही है जिसे दुर्गा माॅ का ज्ञान होगा कि दुर्गा किसके नाम का सिंदूर अपनी माँग में भर्ती है सुबह-शाम आरती में हम गाते है कि ''माँग सिंदूर बिराजे ''

बुधवार, 9 मार्च 2016

reality


ॐ भूर्भुव स्वाहा तत्सवितुर्वरेंयं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न प्रचोदयात् 🔑इस मंत्र को आप गायत्री मंत्र कहते हैं यह मंत्र यजुर्वेद अध्याय 36 का मंत्र 3 है इस मंत्र में ओम नहीं लगा हुआ है और इस मंत्र के आगे ॐ लगाना भी महापाप है क्योंकि सच्चिदानंदघन ब्रह्म की बाणी में ना तो कुछ बढ़ा सकते हैं ना तो घटा सकते हैं क्योंकि यह दोनों ही पाप है इसलिए इस मंत्र का जाप करना व्यर्थ है इस जानकारी को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें

मंगलवार, 1 मार्च 2016

सत साहेब

सत् साहेब। दोस्तों आप सभी शिक्षित हो पढे लिखे हो प्लीज विचार करे। इंसान भगवान् की भक्ति केवल सुख शान्ति कारोबार में उन्नति शारीरिक सुख बच्चों का सुख पत्नी का सुख माँ बाप का सुख भाई का सुख व् आने वाले समय में आने वाली परेशानियो से निजात पाने के लिए भक्ति करता है। हिन्दू समाज में हम पंडितो के मार्ग दर्शन अनुसार हम केवल भगवान् राम व् उसकी भक्ति को ही ज्यादा महत्व देते है। दोस्तों भक्ति की सुरुवात करने से पहले हमें ये जांच लेना चाहिये की हम जिस को भगवान् मानकर पूज रहे है क्या वो वास्तव में भगवान् है और हमें वे सारे सुख दे सकता है जो हमें चाहिए। 1. जब रामचंद्र जी का राज्य सुख भोगने का समय आया तो उनको स्वयं को 14 वर्ष का वनवाश हो गया। गर्मी सर्दी सहनी पड़ी खाने को समय पर खाना नहीं मिलता था। रहने को टूटी हुई से झोपड़ी बनानी पड़ी जंगली जानवरो का सदा भय बना रहता था। आदि। सोचे........जब रामचंद्र जी स्वयं राज का सुख नहीं भोग सके तो आपजी को कहा से सुख दे सकते है। 2. वनवास में जाते वक़्त उनके माता पिता दशरथ जी व् कौशल्या जी उनको जाने के लिए मना कर रहे थे। लेकिन माता पिता की आज्ञा ना मानकर वे जबरन जंगल में चल दिए और पीछे से उनके पिता का निधन हो गया और माता जी लगभग पागल सी हो गई थी। सोचे.......... रामचंद्र जी बचपन में 4 साल से लेकर 18 वर्ष तक तो सृष्टिकर्ता वाल्मीकि जी के आश्रम में बाण विधा सिखने गए और वहीँ रहे। उसके उपरान्त घर आये तो 14 वर्ष का वनवाश हो गया। वनवास से वापस आये तो उससे पहले बाप की मौत हो चुकी थी व् माता आधी पागल हो चुकी थी। अर्थात जब रामचंद्र जी अपने माता पिता का सुख नहीं भोग सके तो उनकी भक्ति से हमें कैसे माँ बाप का सुख हो सकता है 3......... वनवास के दौरान सीता जी को रावण उठा ले गया अर्थात भगवान् की औरत को एक आदमी उठा ले गया (रावण केवल लंका देश जा एक राजा था और रामचंद्र जी भगवान् विष्णु के अवतार अर्थात स्वयं भगवान्) सीता 10 साल तक भूखी प्यासी रावण से नौ लखाबाग में रही उसके बाद युध्द करके सीता को अयोध्या लाये तो 1 साल बाद एक धोभी के कहने से गर्भवती सीता को जंगल में निकाल दिया और सीता आजीवन जंगल में ही रही। सोचे......... रामचंद्र जी स्वयं पत्नी का सुख नहीं भोग पाये तो उनकी भक्ति से हमें कैसे पत्नी सुख मिल सकता है। 4............ 14 वर्ष के वनवास के समय अपने 2 भाईओ भरत व् शत्रुधन से दूर रहे। और जंगल में ही सीता जी ने लव व् कुश नामक दो बच्चों को जन्म दिया जो आजीवन जंगल में ही उनसे दूर रहे कभी अयोध्या में नहीं आये। सोचे........ रामचंद्र जी स्वयं अपने भाईओ व् पुत्रो का सुख नहीं भोग सके और ना उनको सुख दे सके हो हमें क्या दे सकते है 5......... लंका से सीता को लाते वक़्त राम को सीता के चरित्र पर शंका हुई और सीता को सबके सामने अग्नि परीक्षा देने को कहा । सीता ने अग्नि परीक्षा दी और पवित्र साबित हुई उसके बाद राम ने उसको अपनाया और फिर एक धोबी के कहने मात्र से घर से निकाल दिया। सोचे...... रामचंद्र जी ने अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी अपनी पत्नी पर विश्वास नहीं किया। वे 2 रुपए की पांच अगरबत्ती जलाने मात्र से आप और हम पर कैसे विश्वास कर लेंगे। 6......... सीता जी को रावण की कैद से छुड़वाने के लिए राम रावण युध्द में 18 करोड़ सेना का कत्ले आम हुवा था (इतिहास गवाह है) जिसमे सुग्रीव की वानर सेना व् जामवंत की भालू सेना से लेकर भील व् आदिवासी आदि शामिल थे। सोचे......... राम रावण युध्द कोई धार्मिक व् सीमाओ का युध्द नहीं था की जिसमे इतनी सेना मरवाई जाये। अगर भगवान् थे तो अपनी पत्नी को स्वयं छुड़वाकर लाते जिस सीता को छुड़वाने के लिये 18 करोड़ औरतो को विधवा बना दिया दिया करोडो बच्चों को यतीम बना दिया अंत में उसी सीता को जंगल में धक्के खाने के लिए छोड़ दिया। अगर सीता को वापस जंगल में ही छोड़ना था तो क्यों 18 करोड़ सेना का नाश करवाया वो रावण की जेल में ही ठीक थी जहा समय पर खाना तो मिल रहा था। 7......... बाली और सुग्रीव दोनों भाइयो का आपस का सम्पति का विवाद चल रहा था रामचंद्र जी ने धोखे से पेड़ की औट लेकर बाली को बाण से मारा और सुग्रीव को राज गद्दी पर बैठाया। क्यों। सोचे....... बाली को एक वरदान मिला हुवा था यदि कोई आपके सामने होकर युध्द करेगा तो उसकी आधी शक्ति आपके अंदर आ जायेगी और आपको कभी जीत नहीं पायेगा। रामचंद्र को इस बात का डर था की मेरी आधी शक्ति बाली में जायेगी और मै हार जाऊंगा इस लिए धोखे से बाण मार।। बताये बाली भगवान् हुवा या रामचंद्र भगवान् हुवा। सोचे..... हम रामचंद्र जी को मर्यादा पुरषोतम कहते है । एक व्यक्ति को धोखे से पेड़ की औट लेकर मारना कहा की मर्यादा है। सोचे...... सीता जैसी पवित्र औरत को एक धोबी के कहने से घर से निकालना कहा की मर्यादा है। क्या आज आप ऐसा कर सकते है। भगवान् होकर एक औरत के लिए 18 करोड़ औरतो को विधवा बना दिया उनके बच्चों को यतीम बना दिया ये कहा की मर्यादा है। सोचे....... माता पिता के रो रो कर मना करने पर की बेटा वनवास में मत जाओ लेकिन उनकी एक ना सुनना ये कहा की मर्यादा है। सोचे........ सीता के जिद्द कर लेने पर की मुझे ये मृग जिन्दा या मुर्दा लाकर दो। भगवान् होकर उस मासूम व् लाचार पशु को मारने के लिए निकल पड़ा ये कहा की मर्यादा है। सोचे....... रामचंद्र जी द्वारा अश्मेघ में छोड़े गए घोड़े को जब लव व् कुश ने पकड़ लिया तो पूरी अयोध्या की सेना लेकर उन माशूम बच्चों को मारने के लिए निकल पड़ना कहा की मर्यादा है। सोचे..... जब लव व् कुश ने रामचंद्र सहित पूरी सेना को युध्द में हरा दिया टी अपनी हार की शर्मींदगी से वापस अयोध्या ना क जाकर सरयू नदी में राम और लक्ष्मण कूद कर आत्म हत्या कर ली। (इतिहास गवाह है ) सोचे...... आज ये पैसो के लालची नकली पंडित व् गुरु कह देते है रामचंद्र जी ने सरयू नदी में जीवित समाधि लेली और कथा का समापन कर देते है। अरे पैसे के लालची मूर्खो उल्टी सीधी कथा कहानी सुनाकर लोगो को पागल बनाकर अपना पेट भरने वाले मूर्खो अगर जीवित समाधी लेना इतना आशान है तो आप भी लीजिये जीवित समाधी क्योंकि आप रामचंद्र के भक्त हो तो आपको भी उनका ही अनुसरण करना चाहिए और अंत में किसी नदी या गंगा जी में या जमीन में खडडा खोदकर रामचंद्र जी की तरह जीवित समाधी लेनी चाहिए तभी तो आपका मोक्ष होगा।क्योंकि आपके भगवान् का भी तो इसी तरह हुवा था। दोस्तों पहले हमारे पूर्वज अशिक्षित थे और पढ़ने का ठेका केवल इन ब्राह्मणों ने ही ले रखा था। इन्होंने हमारे सद् ग्रंथो को जैसा आधा अधूरा समझा वैसा हमारे अनपढ़ पूर्वजो को सुना कर दान दक्षिणा लेकर अपना पेट पालते थे। लेकिन अब इनकी पोल खुलने लगी है आज हर आदमी शिक्षित हो रहा है अपने सद् ग्रंथो की सच्चाई व् उनमे वास्तव में क्या ज्ञान छुपा है पढ़ व् समझ रहा है। अब शिक्षित समाज इनके पाखंड व् आडम्बरो में नहीं आने वाला है। विशेष। आज हम किस ख़ुशी में दीवाली मनाये। 😔😔😔😔😔😔😔 ? क्या सीता ने कभी दीवाली मनाई ? क्या राम ने कभी दीवाली मनाई ? क्या उनके माता पिता ने कभी दीवाली मनाई ? क्या उनके खानदान में किसी ने दीवाली मनाई 😄😄😄😄😄😄😄😄😄 जरा सोचे क्या हम वास्तव में उस परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना मानव है मानव वो है जिसमे मानवता हो दया प्रेम हो लेकिन आज के दिन। हम हजारो के पटाखे फोड़ते समय आनंद का अनुभव करते है और किसी जरूरत मंद के मदद मांगने पर कहते है अभी हाथ टाइट चल रहा है सारे नियम कायदे कानूनों को टाक में रखकर पर्यावरण की ऐसी की तैसी कर देंगे। और पर्यावरण दिवस पर हरे हरे पोधो के बैनर हाथ में लेकर सड़को पर लोगो को सन्देश देते फिरते है आज लोगो के घर घर जाकर गले मिलते है प्यार प्रेम से रहने के वादे करते है। और अगले ही दिन सड़को पर जरा से साइड की बात को लेकर हाथा पाई करते है। लक्ष्मी की फ़ोटो खरीद कर पूजा करते है धन सम्पदा के लिए। अगले ही दिन उस लक्ष्मी (25 रुपए) को बेच देते है ठेके वाले को दारु के एक पव्वे के लिए। 🙈आज का दिन पैसे वालो के लिए दीवाली और गरीब के लिए दिवाला है🙈